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मुजफ्फरनगर के दर्जन भर ईंट भट्टा पर बंधक मजदूर हरिद्वार से मुक्त,
March 19, 2020 • Dr. Arshad Samrat

 उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले के करीब 12 बंधुआ मज़दूरों को जिसमें औरते एवं बच्चे भी शामिल थे आज उत्तराखंड के हरिद्वार जिले की रुड़की तहसील से मुक्त कराया गया है। मुजफ्फरनगर के इन भट्टा मजदूरों की गरीबी एवम् बेरोजगारी का फायदा उठाकर भट्टा मालिक इन्हे हरिद्वार जिले में स्थित अपने ईंट भट्टों पर ले आया। 
यहां मजदूर शाकिर ने टीम को बताया कि इन्हे बंधक पिछले 4 माह से बंधक बनाकर रखा गया है और  इनकी मजदूरी भी नहीं दी गई है। जब इन्होंने अपना मेहनताना कि बात की तो इन्हे डराया एवं धमका गया। इन्होंने किसी तरह "एक्शन ऐड़" एवं नेशनल कैम्पेन कमिटी फ़ॉर इरेडिकेशन ऑफ बोंडेड लेबर" के कार्यकर्ताओं से संपर्क किया। उन्होंने अपने स्तर से इन्हे मुक्त करने का बीड़ा उठाया।टीम ने ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क से संपर्क किया और एक टीम बनाकर इस अभियान के लिए दिल्ली से रवाना की। 
समिति ने हरिद्वार प्रशासन से संपर्क करके उनकी भी एक टीम का गठन कराया।इसके बाद प्रशासन ने दिल्ली से आयी मानाधिकारवादियों की टीम को लेकर ईंट भट्ठे पर रेस्क्यू अभियान चलाया। हरिद्वार प्रशासन के सहयोग और संयुक्त साझा प्रयास से आज अभियान को सफलता मिली है। ईंट भट्टे पर मजदूरों की हालत काफी दयनीय थी उनके लिए राशन आदि की व्यवस्था भी नहीं थी। मौके पर नायब तहसीलदार मंगलौर सुरेश सैनी ने सभी मजदूरों का बयान दर्ज किया। लेबर ऑफिसर ने भट्टा मालिक को बुलाकर बताया गया कि लेबर लॉ एक्ट 1976 के तहत अनपर क्या कार्यवाही हो सकती है। पुलिस अधिकारी ने कहा भट्टा मालिक को हर मजदूरों का इन एवं आउट पलायन पंजीकरण करना चाहिए।

मानवाधिकार कार्यकर्ता निर्मल गोराना के अनुसार उत्तर प्रदेश की सरकार को तत्काल बंधुआ मज़दूरों के पुनर्वास की योजना 2016 के तहत पुनर्वासित करना चाहिए। पुनर्वास के अभाव में मजदूर फिर से प्रवास या पलायन को मजबूत हो सकते है। 

रेस्क्यू अभियान टीम का हिस्सा रहे मानवाधिकार कार्यकर्ता क़मर इंतेख़ाब ने कहा कि भट्टा मज़दूरों की हालत वर्तमान में बडी दयनीय है अधिकतर मजदूर भूमिहीन एवं अत्यंत गरीब है जो बँधुआ मजदूरी के जाल में फस जाते है। उत्तराखंड एवं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अशिक्षित दलित एवं मुस्लिम परिवार अधिक शोषित है।
ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क के वकील ऑस्बर्ट खिलोंग  ने रेस्क्यू अभियान में बताया कि बंधुआ मज़दूरों को तीन तीन लाख रुपए प्रति मजदूर, आवास एवं खेती के लिए भूमि आवंटन से लेकर मजदूरों के शिक्षा एवम् स्वास्थ्य सुविधाएं तक पुनर्वास के तहत प्रदान कि जानी है। ताकि पीड़ितो को समाज की मुख्य धारा से जोड़ा का सके और वापस गुलामी कुचक्र में ना पड़ना पड़े। 
हाई कोर्ट के वकील अरुण जे ने कहा कि मजदूरों को अभी प्रशासन के सहयोग की आवश्यकता है। पूर्व में भी संगठनों के प्रयास से मुक्त बंधुआ मज़दूरों को पुनर्वास ना मिलने की वजह से मजदूरों को हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा था। जो आज भी कोर्ट में विचाराधीन है।

आज के रेस्क्यू अभियान में में दिल्ली से आये ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क के वकील, हरिद्वार प्रशासन, एक्शन एड इंडिया एवं यूनिसेफ की नई पहल आदि संस्थाओं का सहयोग रहा।

अधिक जानकारी के लिए संपर्क करे।
क़मर इंतेखाब
9990505438