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दो राजधानियों वाला पांचवां राज्य बना उत्तराखंड, जानें नई राजधानी गैरसैंण की कुछ खास बातें
March 6, 2020 • Dr. Arshad Samrat


उत्तराखंड देश का ऐसा पांचवां राज्य बन गया है जिनके पास एक से अधिक राजधानियां हैं. आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर में भी 2 राजधानी है. गैरसैंण भी अब राजधानी के रूप में राष्ट्रीय पटल पर आ गया है.
गैरसैंण बनी उत्तराखंड की ग्रीष्मकालीन राजधानी
देहरादून अब भी उत्तराखंड की अस्थायी राजधानीगैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग बेहद पुरानी
उत्तराखंड में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बजट पेश किए जाने के दौरान बुधवार को चमोली जिले के गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने का ऐलान कर दिया. कहा जा रहा है कि इस ऐतिहासिक ऐलान से पहले उनके कैबिनेट के कई सहयोगियों को भी इसकी जानकारी नहीं थी.

अलग राज्य के रूप में अस्तित्व में आने के बाद स्थायी राजधानी को लेकर उत्तराखंड में पिछले 20 साल से बात कही जा रही है, लेकिन आज तक स्थायी राजधानी नहीं मिल सकी. देहरादून राज्य की राजधानी है, लेकिन वह अभी भी अस्थायी राजधानी के रूप में ही है. गैरसैंण को राजधानी बनाने की मांग नई नहीं है. राज्य आंदोलन के दौरान भी गैरसैंण को ही राजधानी बनाने की मांग थी.

बता दें कि उत्तराखंड में प्रशासकीय तौर पर दो मंडल हैं, कुमाऊं और गढ़वाल. राज्य बनने के बाद गढ़वाल और राज्य की सीमा पर स्थित देहरादून को राजधानी बनाया गया तो कुमाऊं के नैनीताल में हाई कोर्ट बना रहा. इसके अलावा उत्तराखंड देश के चुनिंदा राज्यों में शुमार है, जहां राज्यपाल के लिए दो राजभवन हैं- देहरादून और नैनीताल में. ग्रीष्मकाल में राज्यपाल यहां प्रवास पर आते हैं.

अब उत्तराखंड देश का ऐसा पांचवां राज्य बन गया है जिसकी 2-2 राजधानियां हैं. आंध्र प्रदेश में 3 राजधानियों का प्रस्ताव है तो हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र में 2-2 राजधानियां हैं. जम्मू-कश्मीर में भी 2 राजधानी हैं लेकिन पिछले साल इसे राज्य की सूची से हटाकर केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया था.


प्राकृतिक रूप से खूबसूरत गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने के ऐलान पर यहां के लोगों में खुशी है तो इसको लेकर राजनीति भी शुरू हो गई है. कांग्रेस की शिकायत यह भी है कि इस विषय पर विपक्ष से कोई चर्चा नहीं की गई. हालांकि कांग्रेस की ओर से कहा जा रहा है कि सत्ता में आने पर गैरसैंण को स्थायी राजधानी का दर्जा दे दिया जाएगा.

गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में बनाए जाने के ऐलान पर जानते हैं, इस क्षेत्र की 11 खास बातें...

1. गैरसैंण उत्तराखंड के चमोली जिले में आता है और इसे नगर पंचायत का दर्जा हासिल है.

2. गैरसैंण नाम का शब्द दो स्थानीय बोली के शब्दों से मिलकर बना है. गैर और सैंण. गैर का मतलब कुमाऊंनी और गढ़वाली दोनों भाषाओं में गहरे स्थान को कहा जाता है और सैंण शब्द का अर्थ मैदानी भू-भाग होता है. इस तरह से इसका अर्थ गैरसैंण यानी गहरे में समतल मैदानी इलाका.

3. ब्रिटिश काल में 1839 में इस क्षेत्र को कुमाऊं से स्थानांतरित करते हुए नवस्थापित गढ़वाल जिले में शामिल कर लिया गया. बाद में 20 फरवरी 1960 को चमोली के रूप में नया जिला बना दिया गया और गैरसैंण इस जिले के तहत आ गया.

4. गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने के बाद अब राज्य की अस्थायी राजधानी देहरादून से इसकी दूरी करीब 260 किलोमीटर है. जबकि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से इसकी दूरी 450 किलोमीटर है. वहीं हरिद्वार से यहां की दूरी 240 किलोमीटर बैठती है.

5. चमोली जिले में पड़ने वाला गैरसैंण उत्तराखंड की पामीर के नाम से जानी जाने वाली दुधाटोली पहाड़ी पर स्थित है, जहां पेन्सर की छोटी-छोटी पहाड़ियां फैली हुई हैं और यहीं पर रामगंगा का उद्भव हुआ है. भौगोलिक तौर पर यह इलाका उत्तराखंड के बीच में पड़ता है. इसलिए भी इसे राज्य आंदोलन के दौरान राजधानी बनाने की मांग थी.

6. गैरसैंण क्षेत्र में स्थानीय तौर पर गढ़वाली और कुमाऊंनी बोली बोली जाती है. हालांकि सरकारी कामकाज के रूप में हिंदी और अंग्रेजी का इस्तेमाल होता है.

7. 2011 की जनगणना के मुताबिक गैरसैंण तहसील की आबादी 62,412 है, जिसमें 28,755 पुरुष और 33,657 महिलाएं शामिल हैं. जबकि साक्षरता दर 78.66% है.

8. गैरसैंण तहसील में 2011 की जनगणना के मुताबिक कुल 13,177 परिवार हैं और यहां का लिंगानुपात 1,170 है जो राष्ट्रीय औसत से कहीं ज्यादा है.

9. 1960 में वीर चंद्र सिंह गढ़वाल की सलाह पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गैरसैंण को राजधानी के लिए उपयुक्त माना था, लेकिन उत्तराखंड के रूप में अलग राज्य की मांग 1990 के दशक के शुरुआती सालों में शुरू हुई थी और उसके बाद से यह मांग बनी रही.

10. सातवीं शताब्दी में भारत यात्रा पर आए चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इस क्षेत्र में ब्रह्मपुर नामक राज्य होने का जिक्र किया था.

11. गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिए बाबा मोहन उत्तराखंडी 13 बार अनशन पर बैठे थे. बेनताल (आदिबदरी) में उनका आखिरी अनशन 38 दिन तक चला था. इसी अनशन के दौरान अगस्त 2004 में उनकी जान चली गई थी